जब बाजार गिरता है, तो सबसे पहले डर पैदा होता है। मोबाइल पर लाल रंग दिखता है, पोर्टफोलियो का नंबर घटता है और मन कहता है अभी निकाल लो, और नुकसान हो जाएगा। यही वो पल होता है जब ज़्यादातर निवेशक म्यूचुअल फंड से पैसा निकालने का फैसला कर लेते हैं। उस समय यह फैसला राहत देता है, लेकिन कुछ साल बाद वही इंसान पछताता है कि काश धैर्य रखा होता। सच्चाई ये है कि हर गिरावट नुकसान नहीं होती, और हर निकासी समझदारी नहीं होती। सवाल है—म्यूचुअल फंड से पैसा निकालना कब गलत फैसला होता है?
मार्केट गिरते ही पैसा निकालना क्यों सबसे आम गलती है
मार्केट का गिरना निवेश का स्वभाव है। उतार-चढ़ाव के बिना रिटर्न नहीं मिलता। लेकिन जैसे ही गिरावट आती है, इंसान इसे स्थायी मान लेता है। उसे लगता है कि अब बाजार और गिरेगा, इसलिए अभी निकल जाना ही समझदारी है। यही सोच panic selling कहलाती है। इतिहास बताता है कि ज़्यादातर बड़े रिटर्न उन्हीं निवेशकों को मिले जिन्होंने गिरावट में धैर्य रखा। डर में निकला पैसा अक्सर ऊँचे स्तर पर वापस नहीं आता।
इसे भी पढ़ें: EMI vs SIP आम आदमी हमेशा गलत फैसला क्यों करता है? जाने पूरी जानकारी
लॉन्ग-टर्म गोल के लिए किया गया निवेश बीच में निकालना
अगर आपने म्यूचुअल फंड में निवेश किसी लंबे लक्ष्य—जैसे रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई या घर—के लिए किया है, तो बीच में पैसा निकालना अक्सर गलत साबित होता है। लंबी अवधि का निवेश समय के साथ बाजार के उतार-चढ़ाव को समतल कर देता है। बीच में निकासी करने से compounding टूट जाती है और सालों की मेहनत बेकार हो जाती है। लॉन्ग-टर्म गोल के लिए किया गया निवेश तभी काम करता है जब आप समय को उसका काम करने दें।
नुकसान देखकर निकलना, लेकिन मुनाफा देखकर रुक जाना
यह इंसानी स्वभाव है—नुकसान दिखे तो दर्द होता है, मुनाफा दिखे तो लालच। कई निवेशक घाटे में तुरंत निकल जाते हैं, लेकिन मुनाफे में बैठे रहते हैं कि “और बढ़ेगा।” यह व्यवहार उल्टा है। घाटे में धैर्य और मुनाफे में अनुशासन ज़रूरी होता है। बिना रणनीति के निकासी करना, खासकर नुकसान में, अक्सर गलत फैसला साबित होता है।
SIP रोककर या तोड़कर निकलना कब नुकसानदायक होता है
SIP का मकसद ही यही है कि आप बाजार के उतार-चढ़ाव से डरें नहीं। गिरावट में SIP जारी रखने से आपको यूनिट्स सस्ती मिलती हैं, जो भविष्य में रिटर्न बढ़ाती हैं। लेकिन जैसे ही बाजार गिरता है, लोग SIP रोक देते हैं या फंड से पैसा निकाल लेते हैं। यही वो समय होता है जब SIP सबसे ज़्यादा फायदेमंद होती है। गिरावट में SIP रोकना अक्सर लंबे समय में रिटर्न घटा देता है।
बिना वजह या प्लान के निकासी करना
अगर आपको पैसों की तुरंत ज़रूरत नहीं है और न ही आपका लक्ष्य बदला है, तब भी सिर्फ डर या अफवाह के कारण पैसा निकालना गलत है। हर निकासी के पीछे साफ कारण और योजना होनी चाहिए। बिना वजह निकासी करने से न सिर्फ रिटर्न कम होता है, बल्कि निवेश की आदत भी कमजोर पड़ती है।
टैक्स का असर न समझकर पैसा निकालना
कई निवेशक टैक्स के असर को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इक्विटी म्यूचुअल फंड में एक साल से पहले निकासी करने पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। इससे आपका नेट रिटर्न और घट जाता है। टैक्स के बाद जो पैसा हाथ में आता है, वह अक्सर उम्मीद से कम होता है। इसलिए टैक्स प्रभाव समझे बिना निकासी करना भी गलत फैसला हो सकता है।

अचानक ज़रूरतों के लिए निवेश तोड़ देना
बहुत से लोग इमरजेंसी के समय म्यूचुअल फंड तोड़ देते हैं। असल समस्या यह है कि उन्होंने अलग से इमरजेंसी फंड नहीं बनाया। निवेश का पैसा इमरजेंसी के लिए नहीं होता। जब भी अचानक ज़रूरत आती है और निवेश टूटता है, भविष्य की योजना पीछे चली जाती है। सही तरीका है—इमरजेंसी फंड अलग रखें, निवेश को समय दें।
इसे भी पढ़ें: SIP शुरू करने से पहले ये 7 सच्चाइयां जान लो नहीं तो सारा पैसा डूब जाएगा यहां पढ़ें पूरी जानकारी
फंड खराब होने और बाजार खराब होने में फर्क न समझना
हर गिरावट में फंड खराब नहीं होता। कभी-कभी पूरा बाजार गिरता है, लेकिन फंड की रणनीति और मैनेजमेंट मजबूत रहती है। ऐसे समय में फंड से निकलना गलत हो सकता है। दूसरी तरफ, अगर फंड लगातार अपने benchmark से पीछे है और रणनीति बदल चुकी है, तब निकलना सही हो सकता है। फर्क समझना ज़रूरी है—बाजार की गिरावट और फंड की कमजोरी अलग बातें हैं।
दूसरों को देखकर पैसा निकाल लेना
“मेरे दोस्त ने निकाल लिया”, “TV पर बोल रहे हैं कि बाजार और गिरेगा”—ऐसी बातें निवेश को नुकसान पहुँचाती हैं। हर निवेशक की स्थिति, लक्ष्य और समयावधि अलग होती है। दूसरों को देखकर लिया गया फैसला अक्सर पछतावे में बदलता है। निवेश में तुलना नहीं, व्यक्तिगत योजना काम करती है।
तो फिर म्यूचुअल फंड से पैसा निकालना कब सही होता है?
यह समझना भी ज़रूरी है कि निकासी हमेशा गलत नहीं होती। अगर आपका लक्ष्य पूरा हो गया है, समयावधि खत्म हो गई है, या फंड की गुणवत्ता वाकई खराब हो गई है—तब निकासी सही हो सकती है। इसके अलावा, asset allocation बदलने के लिए भी आंशिक निकासी समझदारी हो सकती है। मुद्दा यह है कि फैसला डर से नहीं, योजना से होना चाहिए।
धैर्य क्यों सबसे बड़ा रिटर्न देता है
निवेश में धैर्य सबसे सस्ता लेकिन सबसे ताकतवर हथियार है। जो निवेशक गिरावट में टिके रहते हैं, वही उछाल में सबसे ज़्यादा फायदा उठाते हैं। बाजार का इतिहास यही सिखाता है कि समय के साथ अच्छे निवेशक हमेशा आगे निकलते हैं। धैर्य की कमी अक्सर औसत रिटर्न से भी नीचे ले जाती है।
इसे तो पढ़ें: लोन लेने की 7 गलतियां जो आपको जिंदगी भर कर्जा में ही रखेगा आप कभी भी इस जाल से नहीं निकल पाओगे यहां पढ़ें पूरी जानकारी
हर निवेशक को याद रखनी चाहिए
म्यूचुअल फंड से पैसा निकालना अपने आप में न अच्छा है, न बुरा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप क्यों और कब निकाल रहे हैं। डर, अफवाह और जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला अक्सर गलत साबित होता है। अगर आपके लक्ष्य, समय और रणनीति साफ हैं, तो गिरावट भी आपके पक्ष में काम कर सकती है। याद रखिए—निवेश में सबसे बड़ा दुश्मन बाजार नहीं, आपका डर होता है।
क्या आपने कभी गिरावट में म्यूचुअल फंड से पैसा निकालकर बाद में पछताया है? या आपने धैर्य रखा और फायदा देखा?
नीचे लिखिए—आपका अनुभव किसी और को सही समय पर सही फैसला लेने में मदद कर सकता है।