भारत का आम आदमी मेहनत करना जानता है, सपने देखना जानता है और ज़िम्मेदारियाँ निभाना भी जानता है। फिर भी जब बात पैसों की आती है, तो वही आम आदमी बार-बार ऐसे फैसले कर बैठता है, जो उसे आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की जगह धीरे-धीरे कमजोर करते जाते हैं। इनमें सबसे बड़ा और सबसे आम फैसला है – EMI को SIP से ऊपर रखना। लगभग हर घर में कोई न कोई EMI चल रही होती है, लेकिन SIP या तो होती ही नहीं, या इतनी छोटी होती है कि उसका कोई खास असर नहीं पड़ता। यही वजह है कि सालों की नौकरी और मेहनत के बाद भी ज़्यादातर लोग financial freedom से बहुत दूर रह जाते हैं।
EMI vs SIP में असली फर्क क्या है, जिसे लोग समझ नहीं पाते
EMI और SIP दोनों ही monthly commitment हैं, लेकिन इनका असर ज़िंदगी पर बिल्कुल उलटा होता है। EMI का मतलब होता है आज कोई चीज़ खरीदना और आने वाले कई सालों तक उसकी कीमत चुकाते रहना। वहीं SIP का मतलब होता है आज थोड़ी कुर्बानी देकर भविष्य के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार तैयार करना। EMI आपको आज की खुशी देती है, लेकिन SIP आपको कल की आज़ादी देती है। समस्या ये है कि आम आदमी को आज की खुशी ज़्यादा साफ दिखाई देती है, जबकि भविष्य की आज़ादी उसे बहुत दूर और अनिश्चित लगती है। इसी मानसिकता की वजह से वह बार-बार EMI को चुन लेता है और SIP को टाल देता है।
आम आदमी EMI को प्राथमिकता क्यों देता है
EMI आम आदमी को इसलिए ज़्यादा पसंद आती है क्योंकि वह तुरंत gratification देती है। नई बाइक, नया मोबाइल, नया टीवी या कार – ये सब चीज़ें तुरंत हाथ में आ जाती हैं। EMI छोटी-छोटी रकम में कटती है, इसलिए आदमी को लगता है कि ये तो आसानी से manage हो जाएगी। वह ये नहीं देखता कि यही छोटी-छोटी EMI मिलकर हर महीने उसकी income का बड़ा हिस्सा खा रही हैं। EMI का असर धीरे-धीरे होता है, इसलिए शुरुआत में दर्द महसूस नहीं होता, लेकिन कुछ साल बाद वही EMI एक बोझ बन जाती है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होता।
SIP इसलिए पीछे रह जाती है क्योंकि उसका फायदा तुरंत नहीं दिखता
EMI की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि उसका फायदा तुरंत दिखाई नहीं देता। पहले कुछ महीनों में SIP का value बहुत कम बढ़ता है, कई बार तो market गिरने पर नुकसान भी दिखने लगता है। आम आदमी यहीं घबरा जाता है और सोचता है कि इससे क्या फायदा। जबकि सच्चाई ये है कि SIP का असली जादू समय के साथ compound होकर दिखता है। SIP उन लोगों के लिए बनी है जो धैर्य रखना जानते हैं, लेकिन आम आदमी अक्सर जल्दबाज़ी में फैसले लेता है। उसे लगता है कि अगर 1–2 साल में बड़ा फर्क नहीं दिखा, तो ये बेकार है, और इसी सोच की वजह से वह SIP को बीच में ही छोड़ देता है।
EMI lifestyle बढ़ाती है, लेकिन wealth नहीं बनाती
एमई आपकी लिफेस्टाइल को बेहतर दिखा सकती है, लेकिन wealth नहीं बनाती। EMI पर ली गई चीज़ें समय के साथ पुरानी हो जाती हैं, उनकी value घटती जाती है, लेकिन EMI चलती रहती है। इसके उलट SIP आपकी lifestyle तुरंत नहीं बदलती, लेकिन आपकी net worth को धीरे-धीरे मजबूत करती है। आम आदमी अक्सर lifestyle upgrade को success समझ लेता है, जबकि असली success financial security होती है। यही कारण है कि लोग नई चीज़ों के पीछे EMI लेते रहते हैं, लेकिन wealth बनाने वाली आदतें develop नहीं कर पाते।
EMI manageable लगती है, यही सबसे बड़ा धोखा है
EMI इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि वह manageable लगती है। ₹2,000 की mobile EMI, ₹4,000 की bike EMI और ₹6,000 की personal loan EMI – अलग-अलग होने की वजह से आदमी को भारी नहीं लगती। लेकिन जब इन सबको जोड़कर देखा जाए, तो हर महीने ₹12,000–₹15,000 सिर्फ EMI में जा रहे होते हैं। अगर यही पैसा SIP में जाता, तो कुछ ही सालों में एक अच्छा fund तैयार हो सकता था। आम आदमी अक्सर EMI को जोड़कर नहीं देखता, और यही गलती उसे लंबे समय तक नुकसान पहुँचाती है।
SIP discipline सिखाती है, EMI मजबूरी बन जाती है
SIP एक discipline है, जो इंसान को पैसे की कद्र करना सिखाती है। SIP आपको long-term सोचने की आदत डालती है और आपको अपने future के लिए ज़िम्मेदार बनाती है। वहीं EMI एक मजबूरी बन जाती है। EMI न चुकाने पर penalty, calls और stress शुरू हो जाता है। EMI आपकी income को पहले ही बाँध लेती है, जबकि SIP आपको अपनी income पर control सिखाती है। आम आदमी अक्सर मजबूरी को चुन लेता है और discipline से भागता है, और यही उसे पीछे रखता है।
Social pressure भी गलत फैसला करवाने में बड़ी भूमिका निभाता है
हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ दिखावा बहुत मायने रखता है। नई car, नया phone और महंगी चीज़ें status symbol बन चुकी हैं। कोई ये नहीं पूछता कि आपके पास कितनी SIP है या आपकी savings कितनी strong है। लोग वही follow करते हैं जो उन्हें बाहर से दिखता है। EMI इस social pressure को पूरा करने का आसान तरीका बन गई है। SIP चुपचाप काम करती है, इसलिए लोग उसकी अहमियत को कम आँकते हैं।
क्या EMI पूरी तरह गलत है या फिर जरूरी भी हो सकती है
ये कहना गलत होगा कि EMI हमेशा ही खराब होती है। कुछ EMI ऐसी होती हैं जो long-term value create करती हैं, जैसे education loan या home loan। ये EMI भविष्य में आपकी earning capacity या stability बढ़ा सकती हैं। लेकिन problem तब शुरू होती है जब luxury और दिखावे के लिए EMI ली जाती है और SIP को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाता है। अगर आपकी income का ज़्यादातर हिस्सा EMI में जा रहा है और SIP zero है, तो आप wealth नहीं बना रहे, सिर्फ खर्च कर रहे हैं।
सही फैसला कैसे लिया जाए, ताकि future सुरक्षित हो
सही फैसला लेने के लिए सबसे पहला rule है – पहले SIP, बाद में EMI। जैसे ही income आए, सबसे पहले SIP auto-debit होनी चाहिए। उसके बाद ज़रूरी खर्च और अंत में EMI। अगर SIP के लिए पैसा नहीं बच रहा, तो इसका मतलब है कि आपकी EMI ज़्यादा है या lifestyle आपकी income से ऊपर चल रही है। lifestyle को थोड़ा slow करना मुश्किल लग सकता है, लेकिन future को fast करने के लिए ये ज़रूरी है।
आम आदमी गलत नहीं है, उसकी financial training अधूरी है
सच ये है कि आम आदमी को कभी सही financial education नहीं दी जाती। उसे EMI के ads हर जगह दिखते हैं, लेकिन SIP की सही समझ कोई नहीं देता। system चाहता है कि लोग खर्च करें, न कि wealth build करें। जो इंसान इस बात को समझ लेता है और EMI से पहले SIP को priority देता है, वही धीरे-धीरे game बदल देता है।
अंतिम सच्चाई जो सोच बदल सकती है
EMI आपको आज खुश रखती है, लेकिन SIP आपको कल आज़ाद बनाती है। आम आदमी हमेशा गलत फैसला इसलिए करता है क्योंकि वह आज को future से ज़्यादा महत्व देता है। जिस दिन ये सोच बदल गई, उसी दिन उसकी financial direction भी बदल जाएगी। असली अमीरी दिखावे में नहीं, बल्कि उस freedom में है जहाँ पैसों की चिंता ज़िंदगी के फैसले तय नहीं करती।











