बीमा लेने के बाद भी लोग परेशान क्यों रहते हैं?: ज़्यादातर लोग मानते हैं कि बीमा लेने के बाद उनकी ज़िंदगी सुरक्षित हो गई। उन्हें लगता है कि अब कोई भी बड़ी परेशानी आएगी तो बीमा कंपनी सब संभाल लेगी। लेकिन असल ज़िंदगी में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास बीमा होने के बावजूद डर बना रहता है। कोई अस्पताल के बिल से घबराता है, कोई क्लेम रिजेक्ट होने से, तो कोई पॉलिसी के नियमों को लेकर कन्फ्यूज़ रहता है। यही कारण है कि बीमा लेने के बाद भी लोग परेशान रहते हैं, क्योंकि उन्होंने पॉलिसी तो ली होती है, लेकिन असली सुरक्षा नहीं।
लोग बीमा एजेंट पर भरोसा करते हैं, सिस्टम पर नहीं
बीमा खरीदते समय ज़्यादातर लोग एजेंट की बातों पर भरोसा कर लेते हैं। उन्हें जो भी समझाया जाता है, वही सच मान लिया जाता है। “सब कवर हो जाएगा”, “क्लेम में कोई दिक्कत नहीं होगी” जैसे वाक्य उन्हें भरोसा दिला देते हैं। लेकिन असल में बीमा एक कानूनी कॉन्ट्रैक्ट होता है, जिसमें हर शब्द का मतलब होता है। जब लोग खुद पॉलिसी नहीं पढ़ते और शर्तें नहीं समझते, तब बाद में क्लेम के समय परेशानी खड़ी हो जाती है।
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गलत बीमा खरीदना सबसे बड़ी गलती होती है
अक्सर लोग वही बीमा ले लेते हैं जो एजेंट बेच रहा होता है, न कि जो उन्हें चाहिए होता है। किसी को ज़्यादा कवर चाहिए, लेकिन उसे छोटी पॉलिसी मिल जाती है। किसी को टर्म इंश्योरेंस चाहिए, लेकिन उसे एंडोमेंट या ULIP दे दिया जाता है। बाद में जब असली ज़रूरत आती है, तब पता चलता है कि बीमा है, लेकिन सही नहीं है। इसी वजह से लोग सुरक्षित महसूस नहीं करते।
बीमा राशि कम होना भी बड़ी चिंता बन जाता है
बहुत से लोगों के पास बीमा तो होता है, लेकिन उसकी राशि बहुत कम होती है। आज के समय में अस्पताल का एक बड़ा इलाज लाखों में पहुँच जाता है। अगर किसी के पास सिर्फ 2–3 लाख का हेल्थ इंश्योरेंस है, तो वह जानते हुए भी डर में रहता है कि गंभीर बीमारी आने पर यह पैसा काफी नहीं होगा। यही वजह है कि बीमा होने के बाद भी मन में चिंता बनी रहती है।
क्लेम प्रोसेस को लेकर डर
भारत में बीमा कंपनियों की सबसे बड़ी बदनामी क्लेम को लेकर होती है। लोगों को डर रहता है कि जब जरूरत पड़ेगी तब कंपनी कोई न कोई बहाना बनाकर पैसा नहीं देगी। बहुत से लोगों ने अपने आसपास ऐसे केस देखे होते हैं, जहाँ क्लेम रिजेक्ट हो गया या बहुत देर से मिला। यह डर बीमा के साथ भी मन में बैठा रहता है।
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छोटे अक्षरों वाली शर्तें परेशानी बनती हैं
बीमा पॉलिसी में कई ऐसी शर्तें होती हैं जो लोग पढ़ते ही नहीं। कौन-सी बीमारी कवर नहीं है, पहले से मौजूद बीमारी पर कितने साल बाद कवर मिलेगा, कौन-सा अस्पताल नेटवर्क में है – ये सारी बातें छोटी-छोटी लगती हैं, लेकिन क्लेम के समय बहुत बड़ी बन जाती हैं। तब लोग महसूस करते हैं कि उन्होंने जो बीमा लिया था, वह उतना मजबूत नहीं है जितना उन्होंने सोचा था।
बीमा को निवेश समझ लेना भी नुकसान देता है
बहुत से लोग बीमा को निवेश मानकर लेते हैं। उन्हें लगता है कि पैसा भी सुरक्षित रहेगा और रिटर्न भी मिलेगा। लेकिन बीमा का असली मकसद सुरक्षा है, कमाई नहीं। जब लोग गलत उम्मीद के साथ बीमा लेते हैं, तो बाद में न सुरक्षा पूरी मिलती है और न पैसा बढ़ता है। इससे निराशा पैदा होती है।
परिवार को जानकारी न होना भी खतरा बनता है
कई बार व्यक्ति ने बीमा ले लिया होता है, लेकिन उसके परिवार को उसकी जानकारी ही नहीं होती। कौन-सी कंपनी, कितनी राशि, क्लेम कैसे करना है – ये सब उन्हें पता नहीं होता। अगर कुछ हो जाए, तो परिवार के लोग और भी ज्यादा परेशान हो जाते हैं। इसलिए बीमा होने के बावजूद सुरक्षा अधूरी रह जाती है।
असल सुरक्षा बीमा लेने से नहीं, सही बीमा लेने से मिलती है
बीमा सिर्फ लेना काफी नहीं है। सही कवर, सही राशि, सही कंपनी और सही जानकारी होना ज़रूरी है। जब बीमा आपकी ज़रूरत के हिसाब से होता है, तब ही मन को सुकून मिलता है। वरना पॉलिसी होते हुए भी डर बना रहता है।
बीमा और मानसिक शांति का रिश्ता
पॉलिसी का सबसे बड़ा फायदा मानसिक शांति होना चाहिए। लेकिन जब पॉलिसी समझ में नहीं आती, कवर कम होता है या क्लेम को लेकर डर रहता है, तब बीमा तनाव का कारण बन जाता है। असली बीमा वही है जो आपको रात को चैन की नींद दे।
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तो क्या करें ताकि बीमा सच में सुरक्षा दे
बीमा लेने से पहले अपनी ज़रूरत समझना, पॉलिसी की शर्तें पढ़ना, कवर पर्याप्त रखना और परिवार को जानकारी देना – ये सब बहुत ज़रूरी है। तभी बीमा सिर्फ एक कागज़ नहीं, बल्कि एक ढाल बन पाता है।
बीमा लेने के बाद भी लोग परेशान क्यों रहते हैं? क्योंकि उन्होंने पॉलिसी तो ली होती है, लेकिन सही सुरक्षा नहीं।
सही बीमा वही है जो मुश्किल समय में आपको अकेला न छोड़े।











